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देहरादून। उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक विरासत को वैश्विक मंच मिलना अब एक सशक्त वास्तविकता बन गया है। प्रदेश के 27 पारंपरिक उत्पादों को हाल ही में GI (Geographical Indication) टैग प्राप्त हुआ है। यह न केवल उत्तराखंड के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक गर्व का विषय है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि को केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त पहल, स्थानीय शिल्पकारों, और किसानों के सतत प्रयासों का परिणाम माना जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कई बार मंचों से “लोकल के लिए वोकल” और “वोकल फॉर लोकल” जैसे अभियानों के माध्यम से पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने पर ज़ोर दिया है। GI टैग उसी दिशा में उठाया गया एक ठोस कदम है।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने इस उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा, “यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है। GI टैग मिलने से हमारे पारंपरिक उत्पादों की गुणवत्ता और प्रामाणिकता को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलेगी, जिससे हमारे कारीगरों और किसानों को नए बाज़ार प्राप्त होंगे। इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा।”
क्या है GI टैग और क्यों है ये अहम?
GI टैग उस उत्पाद को दिया जाता है जिसकी उत्पत्ति किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से होती है और जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषताएं उस स्थान से जुड़ी होती हैं। उत्तराखंड के जिन उत्पादों को GI टैग मिला है, उनमें प्रमुख हैं:
पंचेश्वर आम, भोटिया ऊन, झंगोरा (फॉक्सटेल मिलेट), रामदाना, काला भट्ट, मडुवा,
ताम्रशिल्प (कॉपर क्राफ्ट), रिंगाल बांस हस्तशिल्प,
पिथौरागढ़ की च्यूरा तेल, और
नैनीताल की नैचुरल हर्बल चाय आदि।
ये उत्पाद न केवल स्वाद और गुणवत्ता में बेजोड़ हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति, परंपरा और कारीगरी के अद्भुत उदाहरण भी हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में खुले नए द्वार
GI टैग मिलने से इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहचान मिलेगी। विशेषज्ञों के अनुसार अब यूरोप, अमेरिका, जापान जैसे देशों से ऑर्गेनिक और पारंपरिक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। यह उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए एक आर्थिक क्रांति साबित हो सकता है।
प्रधानमंत्री की नीति का असर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई “वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट” (ODOP) योजना के तहत उत्तराखंड ने अपने हर ज़िले की पारंपरिक विशिष्टताओं को उभारने का कार्य किया है। GI टैग उसी नीति का साकार रूप है।
स्थानीय कारीगरों को मिलेगा नया जीवन
इस पहल से हजारों स्थानीय कारीगर, बुनकर, कृषक, और हस्तशिल्प से जुड़े समुदायों को आर्थिक संबल मिलेगा। अब सरकार द्वारा इन्हें ब्रांडिंग, पैकेजिंग, निर्यात सहायता, और मार्केटिंग प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
निष्कर्ष:
“विकास भी, विरासत भी” की भावना के साथ उत्तराखंड ने न केवल अपनी सांस्कृतिक पहचान को संजोया है, बल्कि उसे वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में यह उपलब्धि “आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में एक प्रेरणादायी उदाहरण है।
